रिपोर्टर गिर्राज बघेल
“ग्वालियर के चिंनौर की जाटव बस्ती में पानी को तरसते लोग, नल-जल योजना बनी मज़ाक”
मध्यप्रदेश सरकार की बहुप्रचारित “नल-जल योजना” ज़मीनी हकीकत में किस हाल में है, इसका दर्दनाक उदाहरण ग्वालियर जिले के चिंनौर गाँव की जाटव बस्ती में देखने को मिल रहा है। यहाँ के ग्रामीण तीन महीने से नल में एक बूंद पानी का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन हर रोज़ उन्हें मायूसी ही हाथ लगती है।
सुबह 4 बजे उठकर 3 किलोमीटर का सफर, सिर्फ पानी के लिए
इस बस्ती में लोग सुबह 4 बजे उठते हैं, सिर पर बर्तन रखकर 3 किलोमीटर दूर पानी लाने जाते हैं। महिलाएं, बुज़ुर्ग और बच्चे रोज़ इस संघर्ष से जूझ रहे हैं। तपती धूप हो पीने का पानी जुटाना इनका रोज़ का काम बन चुका है।
500-600 रुपये में खरीदना पड़ता है पानी
जिनके पास कुछ पैसे हैं, वे 500 से 600 रुपये में निजी टैंकर बुलवाते हैं। लेकिन गरीब मजदूर परिवारों के लिए ये भी संभव नहीं। उनके हिस्से में सिर्फ सूखे नल, खाली बर्तन और प्यास बची है।
योजना ज़मीन पर फेल, शिकायतें बेअसर
सरकार की “हर घर नल से जल” योजना यहाँ सिर्फ बोर्ड और बैनरों तक सीमित है। ग्रामीणों ने सरपंच, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्रीय विधायक और तहसील प्रशासन कलेक्टर जनसुनवाई तक पानी की समस्या पहुंचाई, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
“पानी नहीं मिलेगा तो कैसे जिएंगे?” – ग्रामीणों की गुहार
बस्ती की महिला सरोजबाई जाटव कहती हैं,
> “तीन महीने से नल से पानी नहीं आया, रोज़ सुबह अंधेरे में जाना पड़ता है। बच्चा बीमार हो जाए तो उसे नहलाने तक को पानी नहीं है।”
रिंकू जाटव, एक मजदूर, कहते हैं,
> “काम पर जाने से पहले 2 घंटे पानी लाने में ही लग जाते हैं। कई बार मज़दूरी भी छूट जाती है।”
प्रशासन की नींद कब खुलेगी?
चिंनौर की यह जाटव बस्ती आज पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है। सवाल यह है कि जब नल-जल योजना चल रही है तो फिर नलों में पानी क्यों नहीं है? और क्या प्रशासन तब जागेगा जब हालात और बिगड़ जाएंगे












